ज़िन्दगी का सबक

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सीखा है ज़िन्दगी का सबक 
कुछ इस तरह,
अपनों ने दिए जख्म और मलहम 
गैर लगा रहे हैं,
ता-उम्र के वादे करके 
दो पल साथ बैठने की गुजारिश भी नहीं,
किसको कहे अपना यहाँ,
जब अपने ही नजरें फेरे जा रहे हैं..!!
ढूँढेंगी नजरें जब इस काफिर को,
दूर….बहुत दूर…..पाओगे हमें,
हम तो तेरे ही दिवाने हैं,
लूट लूट के ही सही,
मगर हंस कर जिए जा रहे हैं…..

(28 नवंबर 2015)


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©Ranjeeta Nath Ghai atrangizindagieksafar, 2016.

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