मैने रिश्तों को बदलते देखा है

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इस मतलबी दुनिया मेँ,
मैने रिश्तों को बदलते देखा है
दोस्तों को नहीं मैने तो
इश्क को भी बिकते देखा है…

क्यों खाते हैं  लोग कसमें
जब उनहोने वादों को टूटते देखा है
कुछ पाने के लिए
अरमानों का गला घुटते देखा है,
शायद इसे कहते है ज़िन्दगी
खुशी के एक पल को तरसते हर शख्स को देखा है,

इस मतलबी दुनिया मेँ,
मैने रिश्तों को बदलते देखा है
दोस्तों को नहीं मैने तो
इश्क को भी बिकते देखा है…

यूँ तो सब है मेरे पास, पर
फिर भी रिश्तों को बिखरते देखा है,
विश्वास करें तो किस पर, यहाँ पर
मैने तो भरोसे को भी टूटते हुए देखा है,
अपनों के लिए वक्त नहीं,
पर गैरों कि महफिल सजाते देखा है,

इस मतलबी दुनिया में,
मैने रिश्तों को बदलते देखा है,
दोस्त को ही नहीं मैने तो
इश्क को भी बिकते देखा है…

दोस्ती भी की और इश्क भी,
सिसकति मोहब्बत को दम तोड़ते भी देखा है,
दिवानगी की हद पार कर के
खुद को लुटते हुए भी देखा है,
हर आहट पर धड़कते  दिल को संभालना,
और फिर झूठी तसल्ली देते हुए भी देखा है,

इस मतलबी दुनिया में,
मैने रिश्तों को बदलते देखा है…
दोसतों को नहीं  मैने तो
इश्क को भी बिकते देखा है…

(07 जुलाई 2014)
_________________
रंजीता नाथ घई

© All rights reserved.
©Ranjeeta Nath Ghai  atrangizindagieksafar, 2016.

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