एक सवाल

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-रंजीता नाथ घई

उन्हें मस्रूफ़िअत से फुरसत नहीं
हमें इंतज़ार की आदत सही
गुज़र गया आज का दिन भी रोज़ की तरह
ना उनको फुर्सत मिली
ना ख़याल आया

*

बेइंतहा उन्हें चाहने की बेबसी मेरी
कुछ किस्मत बुरी,
तो कुछ वक्त ही बुरा सा है…
याद करते नहीं, तो याद आते ही क्यूँ हो
ख्यालों में आ-आ के सताते क्यों हो?

*

हमने जब चुप्पी साधी
तब इलज़ाम हमारे सर पर था
कभी संगदिल,
तो कभी पत्थर दिल कहलाये गए|
कभी कभी तो एक सवाल सा मेरे ज़हन में उठता है…

*

क्या अस्तित्व है आज मेरा उनकी ज़िन्दगी में?
क्या सिर्फ फुरसत मिलने पर ही याद आती हूँ?
इस जुदाई में क्या उस ने पा लिया होगा?

क्या फर्क पड़ता है…
मेरे होने या ना होने से?

—–XxXxX—–

© All Rights Reserved.
©Ranjeeta Nath Ghai,  atrangizindagieksafar, 2016.

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9 thoughts on “एक सवाल

  1. बहुत खूब बहुत खूब रंजीता जी ख़ासकर ये अंतरा
    “बेइंतहा उन्हें चाहने की बेबसी मेरी
    कुछ किस्मत बुरी,
    तो कुछ वक्त ही बुरा सा है…
    याद करते नहीं, तो याद आते ही क्यूँ हो
    ख्यालों में आ-आ के सताते क्यों हो?”

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